जगदलपुर,20 अक्टूबर 2026

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में शामिल निशा जात्रा का विधान 19 अक्टूबर की आधी रात को संपन्न हुआ। जगदलपुर के अनुपमा चौक स्थित निशा जात्रा गुड़ी में देवी-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी, मांझी-चालकी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

दीपों की रोशनी में निभाई गई धार्मिक परंपरा

निशा जात्रा के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, दीपों की रोशनी और आतिशबाजी के बीच धार्मिक अनुष्ठान किए गए। राजपरिवार के सदस्यों ने मंदिर पहुंचकर देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की और बस्तर सहित पूरे देश की सुख-शांति, खुशहाली और समृद्धि की कामना की।

बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इस आयोजन में स्थानीय देवी-देवताओं, राजपरिवार, पुजारियों और ग्रामीण समुदायों की महत्वपूर्ण भागीदारी रहती है।

भैरव देव की पूजा के बाद संपन्न हुआ विशेष विधान

परंपरा के अनुसार, सबसे पहले भैरव देव की पूजा की गई। इसके बाद मंदिर परिसर में 12 बकरों की बलि देने का धार्मिक विधान संपन्न हुआ। मावली मंदिर, सिंहद्वार और काली मंदिर में भी विशेष पूजा-अर्चना की गई।

दंतेश्वरी मंदिर में काले कबूतर और सात मोंगरी मछलियों का भोग अर्पित किया गया। वहीं, श्रीराम मंदिर में उड़द दाल का भोग और रखिया कुम्हड़ा की प्रतीकात्मक बलि दी गई।

इन सभी धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपराओं का विधि-विधान से निर्वहन किया गया।

12 गांवों से 24 मटकों में पहुंचा भोग-प्रसाद

निशा जात्रा की खास बात यह रही कि 12 गांवों के राउत ग्रामीण 12 कांवड़ों में 24 मिट्टी के मटके लेकर पहुंचे। इन मटकों में पारंपरिक भोग-प्रसाद लाया गया था।

इस धार्मिक आयोजन के लिए सिंगनपुर, राजूर, छिटकागुड़ा, एरंडवाल, मुसलीगुड़ा, उडुवा, नैनपुर, रायकोट, आरापुर, चालकीगुड़ा, चोकर और धर्माउर गांवों के राउतों ने भोग-प्रसाद तैयार करने की जिम्मेदारी निभाई।

ग्रामीण समुदायों की यह भागीदारी बस्तर दशहरा की सामूहिक परंपरा और स्थानीय संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान है। पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं में गांवों की सक्रिय भूमिका आज भी बनी हुई है।

अब मावली परघाव की होगी रस्म

निशा जात्रा संपन्न होने के बाद अब बस्तर दशहरा की अगली प्रमुख रस्म मावली परघाव की तैयारी होगी। इस परंपरा में माता की डोली और छत्र का विधि-विधान से स्वागत किया जाता है।

मावली परघाव बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में शामिल है। इसमें स्थानीय देवी-देवताओं, राजपरिवार, पुजारियों और ग्रामीण समुदायों की सहभागिता रहती है।

बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, जनजातीय संस्कृति और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है। निशा जात्रा जैसे अनुष्ठान इस विशिष्ट परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts