जगदलपुर, 22 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की प्रमुख रस्म ‘भीतर रैनी’ बुधवार देर रात पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाई गई। लगभग 600 साल पुरानी इस अनोखी परंपरा में आदिवासी ग्रामीणों ने आठ चक्कों वाले विशालकाय विजय रथ को चलाया और आधी रात को रथ को लेकर कुम्हड़ाकोट के जंगल की ओर रवाना हुए। इस रथ पर बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का छत्र विराजमान रहता है।

बस्तर में करीब 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा पर्व अपनी विशिष्ट परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। भीतर रैनी की रस्म इसी पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें आदिवासी समाज की ऐतिहासिक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता की झलक देखने को मिलती है।

क्या है भीतर रैनी की अनोखी परंपरा?

भीतर रैनी के दौरान आठ चक्कों वाले विशालकाय रथ को जगदलपुर शहर में घुमाया जाता है। इसके बाद आधी रात को माड़िया जनजाति के लोग रथ को लेकर मंदिर से लगभग चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में पहुंचते हैं। रथ को इस तरह ले जाने की परंपरा को प्रतीकात्मक रूप से ‘रथ चोरी’ कहा जाता है।

मान्यता के अनुसार, राजशाही के समय माड़िया समुदाय के कुछ लोग राजा से असंतुष्ट होकर रथ को चुराकर एक स्थान पर छिपा देते थे। इसके बाद राजा विजयादशमी के दूसरे दिन कुम्हड़ाकोट पहुंचते थे और ग्रामीणों को मनाकर उनके साथ ‘नवा खानी’ यानी नए चावल से बनी खीर खाने की रस्म निभाते थे। इसके बाद रथ को वापस जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता था। रथ की वापसी से जुड़ी इस परंपरा को ‘बाहर रैनी’ कहा जाता है।

रथ खींचने उमड़ते हैं हजारों आदिवासी

भीतर रैनी की रस्म में आज भी बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण भाग लेते हैं। कुम्हड़ाकोट पहुंचने के बाद रथ को ग्रामीण मिलकर खींचते हैं और लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर तक लाते हैं।

इस पारंपरिक आयोजन को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटते हैं। विशालकाय रथ, जनजातीय सहभागिता और सदियों पुरानी परंपराएं बस्तर दशहरा को दूसरे पर्वों से अलग पहचान देती हैं।

आज निभाई जाएगी बाहर रैनी की रस्म

भीतर रैनी के बाद गुरुवार, 22 अक्टूबर को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचकर ग्रामीणों को मनाने की परंपरा निभाएंगे। इसके बाद नवा खानी की रस्म संपन्न होगी और विशालकाय विजय रथ को वापस जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर लाया जाएगा।

बस्तर दशहरा की ये रस्में केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की जनजातीय संस्कृति, ऐतिहासिक परंपराओं और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी हैं। सदियों से चली आ रही इन परंपराओं का आज भी पूरे उत्साह के साथ निर्वहन किया जा रहा है।

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