बिलासपुर,31 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की अदालतों और पुलिस थानों में महिलाओं एवं यौन अपराधों से जुड़े मामलों की भाषा में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब अदालतों के फैसलों, FIR और चार्जशीट में महिलाओं के लिए ‘रखैल’, ‘चरित्रहीन’ जैसे अपमानजनक और रूढ़िवादी शब्दों के इस्तेमाल से बचने के निर्देश दिए गए हैं।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर प्रदेश की सभी 24 जिला एवं सत्र अदालतों, छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी, राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, गृह विभाग, DGP और महिला एवं बाल विकास विभाग को आदेश की प्रति भेजी है। संबंधित संस्थानों को इन निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बड़ा बदलाव
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आपराधिक पुनरीक्षण मामले में की गई असंवेदनशील और आपत्तिजनक टिप्पणियों के बाद सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए रिटायर्ड जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित की थी।
समिति की रिपोर्ट ‘Judgment and Gender: Sensitivity and Compassion in Writing Judgments’ के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में फैसले लिखने के दौरान लैंगिक संवेदनशीलता और गरिमापूर्ण भाषा अपनाने पर जोर दिया है।
तय की गईं पांच प्रमुख व्यवस्थाएं
1. गवाहों और पीड़ितों को मिलेगा सम्मानजनक माहौल
अदालत में आने वाले पीड़ितों और गवाहों को लंबे समय तक इंतजार कराकर परेशान नहीं किया जाएगा। उन्हें कोर्ट परिसर में कुर्सी, पानी और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। गवाहों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
2. FIR और चार्जशीट की भाषा में बदलाव
पुलिस को निर्देश दिया गया है कि FIR दर्ज करते समय और चार्जशीट तैयार करते समय महिलाओं के पहनावे, चाल-चलन या चरित्र को लेकर रूढ़िवादी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल न किया जाए। अपराध की जांच में पीड़िता के व्यक्तिगत जीवन को अनावश्यक रूप से केंद्र में रखने से भी बचने को कहा गया है।
3. यौन अपराध और POCSO मामलों में बंद कमरे में सुनवाई
यौन अपराधों और POCSO मामलों की सुनवाई संवेदनशील परिस्थितियों में इन-कैमरा की जाएगी। ऐसे मामलों में पीड़िता की पहचान की गोपनीयता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया है।
4. न्यायिक अधिकारियों और पुलिस की ट्रेनिंग
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी को न्यायिक अधिकारियों, सरकारी वकीलों और पुलिस अधिकारियों के लिए विशेष ओरिएंटेशन और संवेदनशीलता कार्यशालाएं आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसका उद्देश्य न्याय प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को जेंडर सेंसिटिविटी और पीड़ित-केंद्रित न्याय के प्रति प्रशिक्षित करना है।
5. पीड़िताओं को जल्द मिले अंतरिम मुआवजा
यौन उत्पीड़न और एसिड अटैक की पीड़िताओं को नालसा की Victim Compensation Scheme 2018 के तहत जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से त्वरित अंतरिम राहत और पुनर्वास सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
न्याय व्यवस्था को पीड़ित-केंद्रित बनाने की पहल
नई व्यवस्था का उद्देश्य अदालतों और पुलिस थानों में इस्तेमाल होने वाली ऐसी भाषा को खत्म करना है, जिससे पीड़ित की गरिमा और मानसिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। कई मामलों में महिलाओं के कपड़ों, चरित्र या निजी जीवन पर सवाल उठाए जाने से उन्हें दोबारा मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
नई गाइडलाइन के जरिए न्याय व्यवस्था को संवेदनशील, गरिमापूर्ण, भयमुक्त और पीड़ित-केंद्रित बनाने की कोशिश की जा रही है। अब FIR से लेकर अदालत के अंतिम फैसले तक सम्मानजनक और लैंगिक रूप से संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल पर विशेष जोर रहेगा।



