रायपुर, 4 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 की अंतिम सांस्कृतिक संध्या नवा रायपुर के राज्योत्सव मेला मैदान में लोकसंस्कृति, संगीत और कला के अद्भुत संगम के रूप में यादगार बन गई। एक ओर छत्तीसगढ़ी माटी की सोंधी महक से सराबोर लोकगीतों की मधुर धुनें गूंजती रहीं, तो दूसरी ओर बॉलीवुड के सदाबहार नगमों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। पंडवानी, पंथी नृत्य, कथक, आदिवासी लोकसंगीत और सूफी संगीत की प्रस्तुतियों ने सांस्कृतिक संध्या में चार चांद लगा दिए।

राज्योत्सव के अंतिम दिन प्रसिद्ध बॉलीवुड पार्श्व गायक अभिजीत भट्टाचार्य, छत्तीसगढ़ी गायक सुनील सोनी और सुप्रसिद्ध लोक कलाकार उषा बारले की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। वहीं शिल्प ग्राम मंच पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से पहुंचे कलाकारों ने छत्तीसगढ़ की लोककला और भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की विविध विधाओं का प्रदर्शन किया।

अभिजीत के सदाबहार नगमों से सजी सुरमयी शाम

राज्योत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में बॉलीवुड के प्रसिद्ध पार्श्व गायक अभिजीत भट्टाचार्य ने अपनी सुरीली आवाज से हिंदी फिल्म संगीत का जादू बिखेरा। उनके लोकप्रिय गीतों ने पूरे माहौल को बॉलीवुड के सदाबहार नगमों के रंग में रंग दिया।

अभिजीत ने ‘चांद तारे’ और ‘बादशाह ओ बादशाह’ जैसे लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति देकर दर्शकों में उत्साह भर दिया। वहीं ‘बहुत खूबसूरत हो’ और ‘वादा रहा सनम’ जैसे रोमांटिक गीतों ने संगीतप्रेमियों को यादगार शाम का एहसास कराया। उनकी प्रस्तुति पर दर्शकों ने खूब आनंद लिया।

सुनील सोनी के गीतों में गूंजी छत्तीसगढ़ की माटी, मया और महतारी की महिमा

छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के लोकप्रिय गायक सुनील सोनी ने अपनी सुमधुर आवाज और मनमोहक गीतों से सांस्कृतिक संध्या को छत्तीसगढ़ी रंगों से सराबोर कर दिया। उनके गीतों में प्रदेश की माटी से जुड़ाव, मां के प्रति सम्मान, प्रेम और आत्मीयता की भावनाएं झलकती रहीं।

सुनील सोनी ने ‘छैंया भुइंया ला छोड़ तैं’ गीत के माध्यम से छत्तीसगढ़ की धरती के प्रति प्रेम और लगाव को स्वर दिया। वहीं ‘झन भूलौ मां-बाप ला’ जैसे भावपूर्ण गीत से माता-पिता के त्याग, ममता और सम्मान का संदेश दिया।

इसके बाद ‘मीठ-मीठ लागे मया के बानी’ और छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘हांडा’ के लोकप्रिय गीत ‘ए गोरी ओ गोरी’ की प्रस्तुति ने माहौल में प्रेम और उल्लास के रंग घोल दिए।

उषा बारले की पंडवानी ने जीवंत की लोकगाथाओं की परंपरा

राज्योत्सव के अंतिम दिन सुप्रसिद्ध लोक कलाकार उषा बारले ने अपनी प्रभावशाली पंडवानी प्रस्तुति से दर्शकों को छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकगाथा परंपरा से रूबरू कराया।

उनकी प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, लोककथाओं और पारंपरिक कला की अनूठी झलक देखने को मिली। पंडवानी के माध्यम से प्रदेश की पीढ़ियों से चली आ रही लोककथात्मक परंपरा मंच पर जीवंत हो उठी।

शिल्प ग्राम मंच पर भारतीय संस्कृति और छत्तीसगढ़ी लोककलाओं के विविध रंग

राज्योत्सव के अंतिम दिन शिल्प ग्राम मंच भी सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहा। यहां भजन गायन, पंथी नृत्य, लोकमंच, जसगीत-जगराता, आदिवासी लोकसंगीत, कथक, सूफी संगीत और नाटक सहित कुल 10 सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया।

रायपुर की सुश्री आस्था भट्ट ने भजन गायन से भक्तिमय वातावरण बनाया। दुर्ग की श्रीमती आरती बारले और रायपुर के श्री दिनेश कुमार जांगड़े के दलों ने पंथी नृत्य प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनृत्य परंपरा की झलक दिखाई।

कबीरधाम के श्री राकेश सेन के नेतृत्व में लोकमंच की प्रस्तुति हुई। वहीं रायपुर की सुश्री पूर्णिमा साहू ने जसगीत-जगराता के माध्यम से छत्तीसगढ़ की देवी आराधना और भक्ति परंपरा को स्वर दिया।

श्री अभिषेक सोनकर के दल ने आदिवासी लोकसंगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति देकर जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को मंच पर उतारा।

कथक, सूफी संगीत और नाट्य प्रस्तुतियों ने बिखेरी छटा

शिल्प ग्राम मंच पर भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मनोहारी छटा भी देखने को मिली। श्रीमती दीपाली पाण्डेय के दल ने कथक समूह नृत्य प्रस्तुत किया, जबकि सुश्री अनुष्णा रॉय चौधरी ने कथक नृत्य के माध्यम से लय, ताल और भाव-भंगिमाओं की सुंदर अभिव्यक्ति की।

इसके साथ ही श्री वृधुमन वचस्पति भारती ने सूफी संगीत की प्रस्तुति देकर माहौल को रूहानियत से भर दिया। वहीं श्री आनंदकुमार पाण्डेय के दल ने नाटक के माध्यम से रंगमंचीय कला का प्रदर्शन किया।

लोकसंस्कृति और आधुनिक संगीत के संगम के साथ हुआ यादगार समापन

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में बॉलीवुड संगीत से लेकर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों और पारंपरिक लोककलाओं तक हर रंग देखने को मिला। अभिजीत के सदाबहार नगमों, सुनील सोनी के माटी से जुड़े गीतों और उषा बारले की पंडवानी ने दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया।

वहीं शिल्प ग्राम मंच की प्रस्तुतियों ने प्रदेश की लोकपरंपराओं और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की विविधता को सामने रखा। इस तरह छत्तीसगढ़ की माटी, लोकगाथाओं, संगीत और कला के अद्भुत संगम के साथ राज्योत्सव की सांस्कृतिक संध्या यादगार बन गई।

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