रायपुर, 29 अक्टूबर 2026
लेखक: धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क अशोक कुमार चन्द्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी
भारत की पहचान उसकी विविधता और एकता में है। यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं और अलग-अलग संस्कृतियों, परंपराओं तथा रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। इसके बावजूद देशवासियों को एक सूत्र में बाँधने वाली भावना राष्ट्रीय एकता है। यह एकता केवल देश की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह भी जुड़ा है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं को देश के साझा भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस करे।
हर वर्ष 31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। यह दिवस उनके ऐतिहासिक योगदान को याद करने के साथ-साथ देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी का एहसास कराता है।
सरदार पटेल ने रखी एकीकृत भारत की मजबूत नींव
वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के समय भारत के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं। अंग्रेजी शासन समाप्त होने के बाद देशी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करना एक बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने वी.पी. मेनन और अन्य अधिकारियों के सहयोग से संवाद, समझदारी और दृढ़ नेतृत्व के माध्यम से रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
सरदार पटेल के नेतृत्व और प्रयासों से सैकड़ों रियासतों के भारत संघ में एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। उनके योगदान ने देश की राजनीतिक एकता, अखंडता और सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह कार्य केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत को एक साझा राष्ट्रीय पहचान देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।
वर्ष 2014 से सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में विशेष रूप से मनाया जा रहा है। इस अवसर पर ‘रन फॉर यूनिटी’, राष्ट्रीय एकता की शपथ और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से एकता और अखंडता का संदेश दिया जाता है। उनकी विरासत हमें सिखाती है कि विभिन्न विचारों, हितों और पहचानों के बीच तालमेल बनाकर ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है।
आज विकास के साथ एकता को मजबूत करना भी जरूरी
आज भारत के सामने चुनौती रियासतों को एकजुट करने की नहीं, बल्कि विकास के लाभों को देश के प्रत्येक क्षेत्र और नागरिक तक पहुँचाने की है। सड़क, रेल, बिजली, संचार और डिजिटल सुविधाओं का विस्तार दूरस्थ क्षेत्रों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ता है। इससे लोगों को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और व्यापार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
हालाँकि, केवल बुनियादी ढाँचे का विकास राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि विकास के समान अवसर, सुलभ सार्वजनिक सेवाएँ और नागरिकों की आवश्यकताओं को उचित महत्व मिले। जब समाज के सभी वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तब देश के प्रति विश्वास और सहभागिता की भावना भी मजबूत होती है।
लोकतंत्र की स्थिरता, स्वतंत्रता की रक्षा और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्रीय एकता और एकीकरण अत्यंत आवश्यक हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव करने वाली संकीर्ण सोच से दूर रहकर हमें समानता, संवैधानिक मूल्यों और आपसी सम्मान को बढ़ावा देना चाहिए।
प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी जनकल्याणकारी योजनाएँ लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में योगदान देती हैं। जब योजनाओं का लाभ जरूरतमंद परिवारों तक पहुँचता है और नागरिकों को आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं, तब व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ता है। यही विश्वास राष्ट्रीय एकता की नींव को मजबूत करता है।
सहकारी संघवाद से मजबूत होगा देश
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार, उद्योग और आंतरिक सुरक्षा जैसे विषयों पर मिलकर काम करने से विकास को गति मिलती है।
लोकतंत्र में राजनीतिक विचारों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं में अंतर होना स्वाभाविक है। महत्वपूर्ण यह है कि इन मतभेदों का समाधान संवाद, संवैधानिक मूल्यों और आपसी सम्मान के माध्यम से किया जाए। जब विभिन्न सरकारें और संस्थाएँ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए जनहित को प्राथमिकता देती हैं, तब राष्ट्रीय एकता और मजबूत होती है।
विकास योजनाओं में स्थानीय जरूरतों का ध्यान रखना भी आवश्यक है। इससे दूरस्थ और पिछड़े क्षेत्रों के नागरिकों को भी देश की विकास यात्रा से जुड़ने का अवसर मिलता है और उनमें राष्ट्र के प्रति अपनत्व की भावना बढ़ती है।
विविधता का सम्मान ही भारत की असली ताकत
भारत की एकता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक जैसी भाषा बोलें, एक जैसी परंपराएँ अपनाएँ या एक जैसे विचार रखें। भारत की वास्तविक ताकत इस बात में है कि अलग-अलग पहचान और जीवनशैली वाले लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हुए साथ रह सकें।
डिजिटल संचार के इस दौर में सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं। ऐसे में अफवाहों से बचना, किसी भी सूचना की सत्यता जाँचना और जिम्मेदारी के साथ अपनी बात रखना पहले से अधिक जरूरी हो गया है। समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियों के बजाय संवाद, सहयोग और भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए।
राष्ट्रीय एकता केवल सरकारी कार्यक्रमों या संदेशों से कायम नहीं रह सकती। इसे मजबूत बनाने के लिए नागरिकों के दैनिक व्यवहार में समानता, संवेदनशीलता और परस्पर सम्मान होना आवश्यक है। दूसरों की भाषा, संस्कृति और मान्यताओं का सम्मान करना भी राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ से बढ़ेगी आपसी समझ
देश की सांस्कृतिक विविधता को समझने और राज्यों के बीच आपसी संबंध मजबूत करने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पहल शुरू की गई। इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा पारस्परिक समझ को बढ़ावा दिया जाता है।
शैक्षणिक गतिविधियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, अंतरराज्यीय यात्राएँ और विभिन्न क्षेत्रों की कला एवं परंपराओं से परिचित कराने वाले आयोजन विशेष रूप से युवाओं में राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित कर सकते हैं। विभिन्न राज्यों की भाषा, खानपान, लोककला और परंपराओं को समझने से लोगों के बीच निकटता बढ़ती है।
युवा देश का भविष्य हैं। शिक्षा, खेल, सामाजिक सेवा, स्वच्छता और जनजागरूकता जैसे कार्यों में उनकी भागीदारी समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जब युवा क्षेत्रीय और भाषाई भेदभाव से ऊपर उठकर देशहित को प्राथमिकता देते हैं, तब एक मजबूत और समावेशी भारत का मार्ग प्रशस्त होता है।
राष्ट्रीय एकता एक निरंतर जिम्मेदारी
राष्ट्रीय एकता दिवस हमें याद दिलाता है कि देश की एकता और अखंडता बनाए रखना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का साझा कर्तव्य है। देश की सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव, विकास के समान अवसर, सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास भी स्थायी शांति के लिए आवश्यक हैं।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारत के राजनीतिक एकीकरण में ऐतिहासिक योगदान दिया। वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह समावेशी विकास, सामाजिक न्याय, आपसी सम्मान और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से इस एकता को और मजबूत बनाए।
राष्ट्रीय एकता का वास्तविक अर्थ यह नहीं है कि देश का प्रत्येक नागरिक एक जैसा सोचे, बल्कि यह है कि अलग-अलग विचारों, भाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद सभी एक साझा भविष्य के निर्माण के लिए साथ खड़े हों। सरदार पटेल की विरासत से प्रेरणा लेकर एकता, सद्भाव और सहयोग को जीवन का हिस्सा बनाना ही राष्ट्रीय एकता दिवस का सच्चा संदेश है।
भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी पहचान और शक्ति है। विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, जातियों और समुदायों के लोग अपनी अलग-अलग जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और रीति-रिवाजों के बावजूद एक राष्ट्र के नागरिक हैं। राष्ट्रीय एकता का धागा ही इन विविधताओं को जोड़कर भारत को मजबूत और संगठित बनाता है।
सरदार पटेल के अखंड भारत के सपने को साकार करने का सबसे सार्थक मार्ग यही है कि हम अपने व्यवहार में समानता, अपने विचारों में उदारता और अपने कार्यों में राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें। यही संकल्प एक मजबूत, समावेशी और विकसित भारत की आधारशिला बनेगा।



