दिल्ली जिमखाना पर कार्रवाई के बीच पाकिस्तान में चर्चा तेज: 218 अरब की सरकारी जमीन पर नाममात्र किराए में चल रहा लाहौर जिमखाना

दिल्ली जिमखाना पर कार्रवाई के बीच पाकिस्तान में चर्चा तेज: 218 अरब की सरकारी जमीन पर नाममात्र किराए में चल रहा लाहौर जिमखाना

नई दिल्ली /लाहौर  , 5 जून 2026

भारत सरकार द्वारा दिल्ली जिमखाना क्लब को भूमि खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद पाकिस्तान के प्रतिष्ठित लाहौर जिमखाना क्लब को लेकर भी बहस तेज हो गई है। दोनों क्लबों की स्थापना वर्ष 1913 में हुई थी, लेकिन आज सरकारी रवैये और भूमि उपयोग को लेकर दोनों देशों में अलग-अलग परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, लाहौर जिमखाना क्लब करीब 112 एकड़ (1091 कनाल) सरकारी जमीन पर संचालित हो रहा है। यह भूमि लाहौर के सबसे प्रीमियम इलाकों माल रोड, जेल रोड और जफर अली रोड के बीच स्थित है। सरकारी दस्तावेजों के हवाले से दावा किया गया है कि इस जमीन की अनुमानित बाजार कीमत करीब 218.2 अरब पाकिस्तानी रुपये है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि बाजार दरों के अनुसार किराया तय किया जाए तो क्लब को हर साल करीब 4.36 अरब पाकिस्तानी रुपये किराया देना चाहिए। हालांकि वर्तमान में क्लब कथित तौर पर सालाना केवल 5,000 पाकिस्तानी रुपये का भुगतान कर रहा है, जिससे सरकारी संसाधनों के उपयोग पर सवाल उठ रहे हैं।

2023 की लीज नीति के बावजूद विवाद

पाकिस्तान सरकार की 2023 भूमि लीज नीति के तहत क्लबों और संस्थानों को जमीन के बाजार मूल्य के आधार पर किराया चुकाना होता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस नीति के तहत भी लाहौर जिमखाना को लगभग 40 करोड़ पाकिस्तानी रुपये वार्षिक किराया देना चाहिए। इसके बावजूद कथित रूप से पुराने किराया ढांचे पर ही क्लब का संचालन जारी है।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि क्लब ने बाग-ए-जिन्ना क्षेत्र में करीब 3.5 एकड़ सरकारी भूमि पर क्रिकेट मैदान विकसित किया है, जिसके लिए किसी औपचारिक लीज या किराए का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

एलीट क्लब और सीमित सदस्यता पर सवाल

लाहौर जिमखाना को पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली सामाजिक क्लबों में गिना जाता है। इसकी सदस्यता मुख्य रूप से वरिष्ठ नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों और प्रभावशाली परिवारों तक सीमित बताई जाती है। आलोचकों का कहना है कि वर्षों से क्लब पर एक विशेष एलीट वर्ग का प्रभाव बना हुआ है और इसकी सदस्यता प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है।

सरकारी आर्थिक सहायता भी चर्चा में

रिपोर्ट के मुताबिक, निजी संस्था होने के बावजूद क्लब को विभिन्न सरकारों और नेताओं से आर्थिक सहायता मिलती रही है। इनमें जिया-उल-हक, नवाज शरीफ, परवेज इलाही और शहबाज शरीफ द्वारा अलग-अलग समय पर दी गई वित्तीय मदद का भी उल्लेख किया गया है।

क्या सरकार वापस ले सकती है जमीन?

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 1996 में क्लब की लीज को 2050 तक बढ़ाया गया था। हालांकि लीज की शर्तों के तहत सरकार के पास 6 महीने का नोटिस देकर लीज समाप्त करने और भूमि वापस लेने का अधिकार मौजूद है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस बहुमूल्य जमीन का उपयोग सार्वजनिक पार्क, खेल सुविधाओं, मियावाकी जंगल या अन्य जनहित परियोजनाओं के लिए किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि इस भूमि से बाजार मूल्य के अनुरूप राजस्व प्राप्त किया जाए तो उसका उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी अस्पतालों और सार्वजनिक सुविधाओं को मजबूत करने में किया जा सकता है।

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