बिलासपुर, 7 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की युगल पीठ में ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ और ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026’ की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुनवाई हुई। याचिका वी.एन. प्रसाद राव एवं अन्य की ओर से अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी के माध्यम से दाखिल की गई है।
मामले की वर्चुअल सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर और वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे ने पैरवी की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नए कानून के प्रावधान अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करते हैं। याचिका में धर्म को व्यक्ति की निजी आस्था और गरिमा से जुड़ा विषय बताते हुए प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अनुमतियों को चुनौती दी गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन के लिए भी सार्वजनिक प्रकाशन और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिसमें करीब 200 दिनों तक की प्रक्रिया शामिल है।
इसके अलावा धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति या पुरोहित के लिए अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान होने पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कानून में कठोर दंडात्मक प्रावधान हैं, जिनमें परिस्थितियों के अनुसार न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कानून के कुछ प्रावधानों के चलते धार्मिक स्थलों पर प्रशासनिक कार्रवाई की जा रही है, जिससे लोगों के धार्मिक आचरण और उपासना की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अंतरिम राहत संबंधी आवेदन पर छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया। राज्य सरकार को अपना पक्ष और जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है।



