लाइफस्टाइल डेस्क, 15 जून 2026
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तेजी से लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। पढ़ाई, नौकरी, रिसर्च और रोजमर्रा के फैसलों में AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसके एक नए खतरे को लेकर चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि AI पर अत्यधिक निर्भरता इंसानों की सोचने, तर्क करने और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर कर सकती है।
हाल ही में ऑक्सफोर्ड, एमआईटी, कॉर्नेल और कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी समेत दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों के 30 से अधिक वैज्ञानिकों ने एक शोध प्रकाशित किया है। शोधकर्ताओं ने इस खतरे को “एपिस्टेमिक रिस्क” (Epistemic Risk) नाम दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब लोग हर छोटे-बड़े सवाल का जवाब AI से लेने लगते हैं, तो उनका दिमाग समस्याओं को खुद समझने और उनका समाधान खोजने की क्षमता खोने लगता है। वैज्ञानिकों ने इसकी तुलना शरीर की मांसपेशियों से की है। जिस तरह लंबे समय तक किसी अंग का उपयोग नहीं करने पर वह कमजोर हो जाता है, उसी तरह सोचने और विश्लेषण करने की क्षमता भी कम हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि AI एक उपयोगी तकनीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए, न कि पूरी तरह उस पर निर्भर होकर। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को अपनी क्रिटिकल थिंकिंग, तर्कशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता को लगातार विकसित करते रहना चाहिए।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि समाज AI पर अंधाधुंध निर्भर होता गया, तो भविष्य में गलत सूचनाओं की पहचान करना, तथ्यों का विश्लेषण करना और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए AI के उपयोग और मानवीय सोच के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है ।


