रायपुर, 21 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ में उपलब्ध कृषि अवशेष, वन संसाधन, पशुधन अपशिष्ट और नगरीय जैव अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा में बदलकर प्रदेश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार व आय के नए अवसर पैदा करने की दिशा में प्रयास तेज किए जा रहे हैं।
कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG), ग्रीन हाइड्रोजन, बायोएथेनॉल और अन्य जैव ईंधनों के क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं के योजनाबद्ध उपयोग से छत्तीसगढ़ को देश की उभरती बायोएनर्जी अर्थव्यवस्था में अग्रणी राज्य बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
इसी विषय को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र, टेक्निकल पार्टनर सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (CEED) तथा छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण के संयुक्त तत्वावधान में अरण्य भवन, नवा रायपुर अटल नगर में कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें शासन, उद्योग, वित्तीय एवं तकनीकी संस्थानों, शिक्षाविदों और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने जैव ऊर्जा की संभावनाओं और भविष्य की रणनीति पर मंथन किया।
कम्प्रेस्ड बायोगैस नीति-2026 से मिलेगी नई दिशा
कार्यशाला में बताया गया कि राज्य सरकार ने जैव ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए छत्तीसगढ़ कम्प्रेस्ड बायोगैस नीति-2026 लागू की है। यह नीति स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, हरित औद्योगिकीकरण, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
इसके साथ ही छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में बायोएनर्जी परियोजनाओं के लिए विभिन्न प्रोत्साहन और सुविधाओं का प्रावधान किया गया है। इन नीतियों के जरिए जैव ऊर्जा परियोजनाओं के लिए निवेश-अनुकूल वातावरण तैयार करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
बायोमास को आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करने पर जोर
छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सुमित सरकार ने कहा कि बायोमास को केवल कृषि अवशेष या अपशिष्ट के रूप में देखने के बजाय इसे ऊर्जा और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण संसाधन बनाना होगा।
उन्होंने कहा कि CBG, बायोएथेनॉल और अन्य बायोफ्यूल जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इससे उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने के साथ सर्कुलर इकोनॉमी को भी मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि राज्य की कृषि और वन आधारित अर्थव्यवस्था जैव ऊर्जा के विकास के लिए अनुकूल आधार उपलब्ध कराती है। संसाधनों को तकनीक, निवेश और प्रभावी बाजार व्यवस्था से जोड़कर नए आर्थिक अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
क्लस्टर मॉडल से किसानों और स्थानीय समुदायों की बढ़ेगी आय
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सीसीएफ, एचआरडी-आईटी आलोक तिवारी (IFS) ने कहा कि राज्य में कृषि, वन, पशुधन और नगरीय अपशिष्ट की उपलब्धता को देखते हुए क्लस्टर आधारित मॉडल प्रभावी हो सकता है।
इस मॉडल से बायोमास के परिवहन की लागत कम करने और जैव ऊर्जा संयंत्रों के लिए फीडस्टॉक की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। साथ ही किसान उत्पादक संगठनों, स्व-सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर उनकी आय बढ़ाई जा सकती है।
विभागों और संस्थाओं के बीच कन्वर्जेन्स जरूरी
CEED के मुख्य कार्यपालन अधिकारी रमापति कुमार ने कहा कि छत्तीसगढ़ की बायोएनर्जी क्षमता को धरातल पर उतारने के लिए कृषि, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, उद्योग, पर्यावरण और वित्त विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
उन्होंने उद्योगों, वित्तीय संस्थानों, किसानों और नागरिक संगठनों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और दीर्घकालिक नीतियों के जरिए छत्तीसगढ़ को बायोएनर्जी के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में शामिल किया जा सकता है।
फीडस्टॉक से बाजार तक मजबूत होगी बायोमास वैल्यू चेन
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में फीडस्टॉक प्रबंधन, बायोमास संग्रहण, परिवहन, भंडारण, तकनीक, बाजार, वित्तपोषण और जैव ईंधन के औद्योगिक उपयोग पर विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने राज्य में उपलब्ध बायोमास संसाधनों का मानकीकृत आकलन और विश्वसनीय डेटाबेस तैयार करने की जरूरत बताई। इसके साथ ही बायोमास कॉरिडोर, मजबूत संग्रहण व्यवस्था और बाजार तक उत्पादों की सुगम पहुंच विकसित करने पर जोर दिया गया।
निजी निवेश और हरित रोजगार पर फोकस
कार्यशाला में निजी निवेश आकर्षित करने के लिए अनुकूल वित्तीय और नियामकीय व्यवस्था विकसित करने तथा फीडस्टॉक के संग्रहण और प्रबंधन में किसान उत्पादक संगठनों, स्व-सहायता समूहों और सहकारी समितियों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, जैव ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार से किसानों को अतिरिक्त आय, ग्रामीण क्षेत्रों में हरित रोजगार और उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा के नए विकल्प मिल सकते हैं।
सरकार, उद्योग और शिक्षाविदों ने साझा किए सुझाव
कार्यशाला में कृषि, वन एवं जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा, स्टेट अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी और रायपुर नगर निगम के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा विभिन्न उद्योगों, वित्तीय एवं तकनीकी संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार रखे।
IIM रायपुर और कलिंगा यूनिवर्सिटी के शिक्षाविदों तथा नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने जैव ऊर्जा के तकनीकी, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर सुझाव दिए।
जैव ऊर्जा से बनेगा नई अर्थव्यवस्था का आधार
कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि नीति, तकनीक, निवेश और स्थानीय समुदायों को एक साझा मंच पर लाकर छत्तीसगढ़ में बायो-रिसोर्स आधारित अर्थव्यवस्था का मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया जा सकता है।
इससे कृषि और वन संसाधनों का बेहतर मूल्य संवर्धन, किसानों और ग्रामीण समुदायों की अतिरिक्त आय, स्थानीय स्तर पर रोजगार तथा उद्योगों के लिए स्वच्छ ऊर्जा के नए विकल्प उपलब्ध होंगे। जैव संसाधनों के वैज्ञानिक और सतत उपयोग से ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक साथ आगे बढ़ाने की दिशा में छत्तीसगढ़ तेजी से कदम बढ़ा रहा है।



