बिलासपुर, 2 जुलाई। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में प्रार्थना के दौरान मंत्रोच्चार कराने संबंधी राज्य सरकार के आदेश को लेकर दायर याचिका पर गुरुवार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के साथ ही छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलमान रिज़वी को फिलहाल राहत नहीं मिल सकी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सरकार का यह आदेश अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में आदेश के क्रियान्वयन के दौरान किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है या कोई संवैधानिक विवाद उत्पन्न होता है, तो याचिकाकर्ता नई याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
संविधान के प्रावधानों का दिया गया था हवाला
पूर्व वक्फ बोर्ड अध्यक्ष अब्दुल सलमान रिज़वी ने याचिका में राज्य सरकार के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए इसे निरस्त करने की मांग की थी। उनका कहना था कि सरकारी स्कूलों में किसी विशेष धार्मिक मंत्र का अनिवार्य उच्चारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता), अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 28 (शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा से जुड़े प्रावधान) का उल्लंघन करता है।
याचिकाकर्ता की ओर से रखा गया पक्ष
सुनवाई के दौरान तहफ़्फ़ुज़-ए-नमूस-ए-रिसालत एक्शन ट्रस्ट (TNRTA) के उपाध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता आमिर खान ने याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत से कहा कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में किसी धार्मिक गतिविधि को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता और ऐसा करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
कोर्ट ने भविष्य के लिए रखा रास्ता खुला
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल आदेश के लागू होने में समय है, इसलिए इस चरण में किसी तरह का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में आदेश के क्रियान्वयन के दौरान किसी नागरिक के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं या संवैधानिक प्रश्न खड़े होते हैं, तो संबंधित पक्ष दोबारा अदालत का रुख कर सकता है।
इस फैसले के बाद फिलहाल राज्य सरकार का सरकारी स्कूलों में मंत्रोच्चार संबंधी आदेश प्रभावी बना रहेगा, जबकि इस विषय पर कानूनी बहस भविष्य में आदेश के वास्तविक क्रियान्वयन के आधार पर फिर से अदालत तक पहुंच सकती है।

